हरियाली के प्रयास

विकास और बढ़ता शहरीकरण एक हद तक ऐसी अनिवार्यता है, जिसकी कुछ अनिवार्य बुराइयां भी हैं। इसका पहला शिकार बनते हैं पेड़ जो हमारी ऑक्सीजन की जरूरत को पूरा करने वाली एकमात्र फैक्ट्री है। सुलभ सड़क का रास्ता निकालना हो या रेल की पटरी बिछानी, या फिर आवास की समस्या हल करनी हो। इन सबके लिए जो जमीन मुहैया होती है, उसमें पहला बलिदान पेड़-पौधों का होता है। वन क्षेत्र सिकुड़ गए हैं और पेड़ों का घनत्व काफी कम हो चुका है। ऐसे में प्रदेश सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है हरियाली वापस लाना। सरकार इसके लिए लक्ष्य तय कर प्रयास कर भी रही है। 2019 में जहां 22 करोड़ पौधे रोपने का लक्ष्य था, वहीं अब वर्ष 2020-21 में 25 करोड़, 2021-22 में 30 करोड़ व 2022-23 में 35 करोड़ पौधारोपण का लक्ष्य रखा गया है। यह लक्ष्य 26 विभाग मिलकर पूरा करेंगे। ग्राम पंचायत स्तर पर जैव विविधता प्रबंध, नियोजन एवं विकास समिति गठित हो चुकी हैं। माइक्रोप्लानिंग के तहत सरकार ग्राम पंचायतवार ‘वृक्ष अभिभावक’ नियुक्त करने की तैयारी में है। वृक्ष अभिभावक नियुक्त करने का विचार सही दिशा में उठाया गया कदम है। अब तक के अभियानों में सामने आया है कि पौधारोपण तो होता है, लेकिन वे अधिक दिन जीते नहीं। अनुभव यह भी है कि संबंधित विभाग या अधिकारी-कर्मचारी सरकार की मंशा के अनुरूप काम नहीं कर रहे हैं। यह तक नहीं पता कि पिछले दो वर्षो में रोपे गए पौधों में से कितने जीवित हैं। दूसरी सबसे बड़ी समस्या पौधों की है। उचित मानक की लंबाई के पौधे पौधारोपण के समय उपलब्ध ही नहीं हो पाते। इसकी आड़ में कई स्थानों पर छोटे-छोटे पौधे भी रोप दिए गए। लेकिन, भुगतान मानक लंबाई के पौधों के हिसाब से किया गया। ऐसा मामला बुलंदशहर में सामने आ चुका है। ठीक ऐसे ही अलीगढ़ में गड्ढे खोदने, ट्री गार्ड आदि के नाम पर करोड़ों का घोटाला कर दिया गया। सरकार वास्तव में अपने लक्ष्य को शत-प्रतिशत प्राप्त करने को लेकर गंभीर है तो उसे ऐसी घटनाओं पर कड़ाई से अंकुश लगाना होगा।

 

By Satendra Singh - Envirnmentalist

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